रविवार, 28 अगस्त 2022

 

      ग़ज़ल
इश्क़ का रंग घुला था मुझमें

जाने कैसा नशा था मुझ में।


सोचा जिसको रात-दिवस ही

अक्स उसी का दिखा था मुझमें।


सारी दुनिया से जो प्यारा

 नाम उसी का लिखा था मुझमें।


मीरा सी मैं भटकूँ दर-दर,

जाने कौन दिखा था मुझमें।


तुझको जाते देखा था जब

छन से कुछ टूटा था मुझमें।


मैं दुनिया में ढूँढ़ रही थी

वो छुपकर बैठा था मुझ में


बन के 'किरण'मैं भूली ख़ुद को,

सूरज ऐसे बसा था मुझ में।

 

        ग़ज़ल

नीर आँखों से हमने बहाया बहुत,

वक़्त ने अपनी धुन पर नचाया बहुत।

 

बात दिल की कभी हम नहीं कह सके,

इसलिए बेकली ने सताया बहुत।

 

कैसे आँखों में सपने सजाऊँ मैं अब,

टूटे सपनों ने मुझको रुलाया बहुत।

 

मैंने अपनी मुहब्बत पे रक्खा यकीं,

इस ज़माने ने मुझको मिटाया बहुत।

 

मैं 'किरण' होके डरती भी कैसे भला,

तीरगी ने मुझे आज़माया बहुत।

 

         ग़ज़ल

वही डर-औ- धड़का नई बात है क्या

ज़माने से शिक़वा नई बात है क्या।

 

भला तुम यूँ डूबे हो क्यों आँसुओं में,

ये बेटी का जाना नई बात है क्या।

 

गिराकर किसी को ख़ुद आगे है बढ़ना

 चलन ही ऐसा नई बात क्या है।

 

बुरा वक़्त आता है सबको परखने,

यही हमने देखा नई बात है क्या।

 

निगाहें बदलती हैं मिलते ही मंज़िल,

यही हाल सब का नई बात है क्या।

 

कभी इश्क़ छुपता नहीं है छुपाये,

हुई हर -सू चर्चा नई बात क्या है।

 

'किरण'लेके आई है फिर से उजाला,

हटेगी ये छाया नई बात क्या है।

 . 

   ग़ज़ल

जमी काई हटाने में बहुत ही देर लगती है,

किसी से दिल लगाने में बहुत ही देर लगती है।

 

घड़ी भर की मुलाकातों से हो जाता है परिचय पर,

उसे रिश्ता बनाने में बहुत ही देर लगती है।

 

नहीं मिलता है मुझको चैन मन बेचैन रहता है,

विचारों को सुलाने में बहुत ही देर लगती है।

 

ज़रा सी बात में झुक जाती है देखो ग़रीबी तो,

अमीरी को झुकाने में बहुत ही देर लगती है।

 

नदी नाले ज़रा-सी धूप से सूखे पड़े लेकिन,

समंदर को सुखाने में बहुत ही देर लगती है।

 

उसे भी वक़्त दो जो आई है घर में नई दुल्हन,

नये घर को बसाने में बहुत ही देर लगती है।

 

'किरण'की ज़िन्दगी का बस यही तो इक फ़साना है,

ग़मों में मुस्कुराने में बहुत ही देर लगती है।


      ग़ज़ल

सामने जब भी उसको पाती हूँ

जाने क्यों ख़ुद को भूल जाती हूँ।

 

है घनी छाँव हर तरफ लेकिन,

धूप में ख़ुद को आज़माती हूँ।

 

राह काँटों से है भरी मेरी,

फिर भी आगे ही बढ़ती-जाती हूँ।

 

दर्द दिल में है रिस रहा मेरे

इसलिए हँसती  खिलखिलाती हूँ ।

 

उसके आने की कुछ ख़बर ही नहीं,

फिर भी हर रोज़ घर सजाती हूँ।

 

उसकी आँखों में है समुंदर वो

जिसमें मैं डूबती नहाती हूँ।

 

ऐ "किरण"नूर बनके आ जाओ,

रात-दिन तुझको मैं बुलाती हूँ।

 

 

       ग़ज़ल


टूटकर बिखरे हैं शीशों की तरह,

ख्वाब मेरे जो थे फूलों की तरह।

 

है कभी ठंढी कभी तो है गरम

याद उसकी है हवाओं की तरह।

 

दिख रही जो दूर से वो है नहीं,

ज़िंदगी तो है सराबों की तरह।

 

आज के इस दौर में हर आदमी,

रुख़ बदलता है लिबासों की तरह।

 

बात उसकी है बहुत उलझी हुई,

वो मुझे लगता सवालों की तरह।

 

आ भी जाओ बज़्म में बैठो मेरे,

नूर बनके अब चरागों की तरह।

 

है 'किरण'देती सदा तुमको सदा,

लौट आना फिर बहारों की तरह।

 

         ग़ज़ल

एक दिन इक पल में ही अच्छा बुरा हो जाएगा,

आप जो सँभले नहीं तो हादसा हो जाएगा।

 

आज सबकी ज़िंदगी में है न जाने क्यों घुटन,

सोच जो बदली न हमने क्या से क्या हो जाएगा।

 

दौर ये आया है ऐसा ख़ुद ही ख़ुद को तोल ले

वरना इक दिन इस जहां से लापता हो जाएगा।

 

दिल के रिश्तों को रखो दिल से सदा ही जोड़ के,

रह गई कोई कमी तो फ़ासला हो जाएगा।

 

रुक गया है जो सफ़र हिम्मत करो आगे बढ़ो,

देखना इक दिन बड़ा ये हौसला हो जाएगा।

 

आँधियों की ज़द से है जो घर बहुत बिखरा हुआ

तिनका-तिनका फिर समेटो घर खड़ा हो जाएगा।

 

है 'किरण'जो साथ तो फिर तीरगी से डर है क्यों,

बढ़ते जाओ फिर तेरा सब कुछ भला हो जाएगा।