रविवार, 28 अगस्त 2022

          ग़ज़ल

 आ गया फिर से वो चेहरा ख्वाब में               

  कर जतन जिसको भुलाया ख्वाब में

 

हैं बहुत अपने यहाँ कहने को तो

नाम बस उसका पुकारा ख्वाब में

 

जब कभी आया है माज़ी याद तो                                

  चैन फिर हमने न पाया ख्वाब में

 

जब बढ़ीं बेचैनियाँ दिल की कभी                     

  आपको हमने बुलाया ख्वाब में।

 

हो गया है बावरा ये मन मेरा

ढूँढ़ता उसको ही रहता ख्वाब में।

 

मेरी ज़ानिब कोई गम आया है तो

भाँप लेता मन ये ख़तरा ख्वाब में

 

 है 'किरण' हर सिम्त फैली रोशनी

 रात में सूरज जो निकला ख्वाब में।

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