ग़ज़ल
टूटकर बिखरे हैं शीशों की तरह,
ख्वाब मेरे जो थे फूलों की तरह।
है कभी ठंढी कभी तो है गरम
याद उसकी है हवाओं की तरह।
दिख रही जो दूर से वो है नहीं,
ज़िंदगी तो है सराबों की तरह।
आज के इस दौर में हर आदमी,
रुख़ बदलता है लिबासों की तरह।
बात उसकी है बहुत उलझी हुई,
वो मुझे लगता सवालों की तरह।
आ भी जाओ बज़्म में बैठो मेरे,
नूर बनके अब चरागों की तरह।
है 'किरण'देती सदा तुमको
सदा,
लौट आना फिर बहारों की तरह।
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