रविवार, 28 अगस्त 2022


             ग़ज़ल

 ख़ुदा ऐसा करे हर होंठ पे मुस्कान हो जाए,

ग़मों की शाम का इस तर्ह फिर अवसान हो जाए।

 

अगर हर शख़्स बच्चों -सा ज़रा नादान हो जाए,

नये इस दौर का हर मसअला आसान हो जाए।

 

बला कोई भी आये तो परेशाँ कर नहीं सकता,

जहाँ का हर बशर इक नेक बस इंसान हो जाए।

 

बहुत है चाह बिखरा दूँ महक हर सू मुहब्बत की,

कभी पूरा यही मेरा भी तो अरमान हो जाए।

 

फ़सल खेतों में झूमेगी धरा सोना उगल  देगी,

अगर खुशहाल मेरे देश का दहकान हो जाए।

 

कोई दुश्मन नहीं आँखें उठाकर देख पाएगा,

सभी के दिल के गर धड़कन में हिंदुस्तान हो जाए।

 

'किरण' की चाह पूरी हो सकेगी गर जो ऐसा हो,

नहीं सूरज ढलेगा ये कभी ऐलान हो जाए।

 

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