ग़ज़ल
ख़्वाब में जबसे वो आने जाने लगे
ज़िंदगी के सभी पल सुहाने लगे।
जो भी काँटे बिछे थे मेरी राह में,
हौसले से मेरे वो ठिकाने लगे।
उनके चेहरे पे थी जाने कितनी शिकन,
सुन के ग़ज़लें मेरी गुनगुनाने लगे।
जाने कितनी शिकायत थी मुझसे उन्हें,
रूबरू देखके मुस्कुराने लगे।
कैसे कह दूँ कि यादों में वो अब नहीं,
आज फिर मुझको वो तो सताने लगे।
जो परिंदे कफ़स में रहे उम्र भर,
आसमाँ देख वो तड़फड़ाने लगे।
आ गई है 'किरण' रौशनी लेके अब,
ये अँधेरे कहीं दूर जाने लगे।
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