रविवार, 28 अगस्त 2022

 

        ग़ज़ल 

कहूँ कैसे सफ़र मेरा सुहाना था,

मुकद्दर में तो बस रोना रुलाना था।

 

किसी के दिल में बसते थे कभी हम भी,

बहुत ही ख़ूबसूरत वो ज़माना था।

 

बहुत मुश्किल था दर्दे-दिल दबा लेना,

करूँ क्या इश्क़ को सबसे छुपाना था।

 

बहाने कर रहा था रोज़ ही मुझसे,

उसे तो लौट के अब फिर न आना था।

 

वो गाफ़िल था सदा अपनी कहानी में,

उसे हर हाल में मुझको सताना था।

 

बहुत ही तल्खियाँ थीं उसके लहज़े में,

मगर उससे मुझे रिश्ता निभाना था।

 

'किरण'के आसमां में वो ही था छाया ,

उसी को देखके बस मुस्कुराना था।

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