ग़ज़ल
वादे वो अपने तोड़ के चुपचाप चल पड़े,
बेबस मुझे वो छोड़के तन्हा निकल पड़े।
लगता था उनको भूल चुके हैं कभी के हम,
लिखने जो बैठे वो मेरी ग़ज़लों में ढल पड़े।
कहते थे जो कि हम न झुकेंगे कभी यहाँ,
देखो ज़रा -सी आँच से वो ही पिघल पड़े।
इतनी ख़लिश दिलों में लिये जी रहे हैं लोग,
गर्दे सफ़र से ही मेरे माथे पे बल पड़े।
उनकी सलामती की दुआ कर रही हूँ मैं,
आए कोई पयाम तो मुझको भी कल पड़े।
हर सू फ़ज़ा में बिखरी हैं यादें उन्हीं की अब,
ख़्वाबों में उनको देख के हम जो मचल पड़े।
अपने क़दम सँभाल के चलना यहाँ 'किरण'
कितने ही लोग राह में अक्सर फिसल पड़े।
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