ग़ज़ल
ख़तावार मैं हूँ सज़ावार मैं हूँ
छपा ही नहीं जो
वो अख़बार मैं हूँ।
वो इंकार मैं हूँ
वो इकरार मैं हूँ,
मुहब्बत का सुंदर
-सा संसार मैं हूँ।
ज़रा मुड़ के देखो
तो मेरी तरफ़ अब,
तुम्हारे बिना कितनी
लाचार मैं हूँ।
मुझे क़ैद करने की
कोशिश न करना,
नदी की मचलती हुई
धार मैं हूँ।
मुझे देखना फिर
झुका लेना नज़रें,
बताता है मुझको
तेरा प्यार मैं हूँ।
मुहब्बत में
जिसके भटकते रहे हो,
कहानी का वो ही
तो क़िरदार मैं हूँ।
ज़रा ख़ुद को देखो
तो अब आईने में,
'किरण' हूँ, चमक हूँ वो सिंगार मैं हूँ।
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