ग़ज़ल
क्यों न वादे को वो निभाते हैं,
जो ग़ज़ल मेरी
गुनगुनाते हैं।
उनको खुद पर
यक़ीं नहीं शायद,
हर घड़ी मुझको
आजमाते हैं।
मौसमों से नहीं
डरा कीजे,
धूप औ छाँव आते
जाते हैं।
कोई पैग़ाम जब
नहीं मिलता,
अश्क़ आँखों में
झिलमिलाते हैं।
सच ही जीतेगा एक
दिन देखो,
शर्त तुमसे ये हम
लगाते हैं।
उनकी बातों पे हो
यकीं कैसे,
करके वादे नहीं
निभाते हैं।
ऐ 'किरण' अब क़मर को देखो
तुम,
वो भी संग उसके
मुस्कुराते हैं।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें