ग़ज़ल
ज़िंदगी का यही तकाज़ा है,
दर्द पाकर भी
मुस्कुराना है।
जब से उसको ख़ुदा
बनाया है,
लोग कहते हैं ये
तमाशा है।
ज़ुस्तज़ू अब नहीं
रही तेरी,
मिल गया अब मुझे
ठिकाना है।
वो बहानों की चढ़
रहा सीढ़ी
उसको फिर लौट के
न आना है।
अब ज़रूरत नहीं
सफ़ीने की,
तैरकर पार मुझको
जाना है।
हल कहीं भी तो है
नहीं मिलता,
ये मुहब्बत भी
कैसा पर्चा है।
प्यास कैसे भला
बुझेगी अब,
दिख रहा हर तरफ
ही सहरा है।
इश्क़ की चोट से
बचे रहना,
वरना फिर टूटकर
बिखरना है।
ऐ 'किरण' ख़ुद को भी सँभालो
अब,
वक़्त के साथ -साथ चलना है।
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