ग़ज़ल
चढ़ते यौवन बहार का मौसम,
ज़िंदगी के सिंगार का मौसम।
चाल जो वक़्त ने बदल ली है,
आ गया फिर से प्यार का मौसम।
अलविदा कहके वो गए जबसे,
हर तरफ़ ही है ख़ार का मौसम।
अर्श पे चाँद जबसे देखा है,
तबसे है ये ख़ुमार
का मौसम।
ऐ 'किरण'जी लो खुल के अब
वरना,
फिर न होगा निखार का मौसम।
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