ग़ज़ल
नदी के किनारे की हर धार पढ़ना,
लिखा लह्र पै उसको हर बार पढ़ना।
अगर पढ़ सको तुम कभी मेरी आँखें,
तो आँखों का सूना वो संसार पढ़ना।
नहीं कोई दौलत मुहब्बत से बढ़के,
अगर कुछ भी पढ़ना फ़क़त प्यार पढ़ना।
अज़ाबों ने रिश्तों को समझा दिया है
सिखा भी दिया अब है मिस्मार पढ़ना।
अगर पढ़ सको तो पढ़ो ज़िंदगी को
सबक सब मिलेंगे कई बार पढ़ना।
अगर चाह है तुझको भी इशरतों की,
तो पैहम ज़माने की रफ़्तार पढ़ना।
'किरण'तीरगी को हराकर
है निकली,
उसी की निगाहों से संसार पढ़ना।
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