शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

        

                       ग़ज़ल

   अश्क़ों के समुंदर में मुरझाई हुई ग़ज़लें,

जज़्बात के दरिया में बलखाई हुई ग़ज़लें।

 

ये किसको सुनाऊँ मैं अब कौन सुनेगा भी,

इस तपती दुपहरी में अलसाई हुई ग़ज़लें।

 

 

दिल को तो लुभाती हैं बेचैनी बढ़ाती हैं,

हर सिम्त फ़ज़ाओं में महकाई हुई ग़ज़लें।

 

 

हँसने भी नहीं देतीं रोने भी नहीं देतीं,

बस ज़िद्द पे अड़ी रहतीं बिखराई हुई ग़ज़लें।

 

होती हैं इशारों में बातें तो मुहब्बत की,

भाती हैं 'किरण'को भी शरमाई हुई ग़ज़लें।

           

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