ग़ज़ल
कुछ ऐसे गीत आज चलो गुनगुनाएँ हम,
ग़मगीन इस जहान को फिर से हँसाएँ हम।
इंसानियत का फ़र्ज़ निभाने के वास्ते,
बिछुड़े हुए दिलों को चलो अब मिलाएँ हम।
इंसान गर जो नेक हैं तो काम कुछ करें,
फाके से मर रहे हैं जो उनको बचाएँ हम।
पूरे नहीं हुए जो सभी ख़्वाब तो चलो,
औरों के वास्ते नई राहें बनाएँ हम।
इल्ज़ाम अपने सर पे जो लेता है
ग़ैर का
ऐसे बशर के सामने ख़ुद को झुकाएँ हम।
कैसे गिला करें कि ज़माना ख़राब है,
जब मैल ख़ुद के दिल का हटा ही न पाएँ हम।
हर रात के तो बाद सहर होती है 'किरण'
मायूसियों को छोड़ चलो मुस्कुराएँ हम।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें