ग़ज़ल
इश्क़ का रंग घुला था मुझमें,
जाने कैसा नशा था
मुझ में।
सोचा जिसको
रात-दिवस ही,
अक्स उसी का दिखा
था मुझमें।
सारी दुनिया से
जो प्यारा,
नाम उसी का लिखा था मुझमें।
मीरा सी मैं
भटकूँ दर-दर,
जाने कौन दिखा था
मुझमें।
तुझको जाते देखा
था जब,
छन से कुछ टूटा
था मुझमें।
मैं दुनिया में
ढूँढ़ रही थी,
वो छुपकर बैठा था
मुझ में।
बन के 'किरण'मैं भूली ख़ुद को,
सूरज ऐसे बसा था
मुझ में।
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